सभी महिलाएं अपनी संतान की सुख समृद्घि और उनकी लंबी उम्र के लिए व्रत रखेंगी।
इस व्रत को हलषष्ठी हलछठ, कमरछठ या खमरछठ नाम से भी जानी जाती है। इस दिन महिलाएं सुबह से महुआ पेड़ की डाली का दातून कर व्रत धारण करती है। घर के आंगन और मंदिरों में सगरी(गड्ढा) बनाकर इसमें पानी भरा जाता है। इसे बेर, पलाश, गूलर के पेड़ों की टहनियों और काशी के फूलों से सजाया जाता है।
यह पूजा दोपहर को होती है। इसके सामने मिट्टी के खिलौने, शिवलिंग, गौरी-गणेश, कार्तिकेय, नंदी, हलषष्ठी माता की प्रतिमा और कलश की स्थापना कर पूजा की जाती है। इसके बाद साड़ी समेत सुहाग का सामान समर्पित किया जाता है और हलषष्ठी माता की कथाएं पढ़ी और सुनाई जाती है। भगवान शिव और हलषष्ठी माता की आरती के साथ पूजा का समापन किया जाता है। पूजा के बाद नए कपड़े के टुकड़े को सगरी के जल में डुबाकर बच्चों के कमर पर से छह बार स्पर्श किया जाता है, जिसे पोती मारना कहते हैं। वहीं लाल चावल, दही और भाजी खाकर व्रत तोड़ा जाता है।

इस व्रत का वैज्ञानिक आधार भी है
उपवास की परंपरा वैज्ञानिकता से परिपूर्ण महिला स्वास्थ्य व पोषण पर आधारित हैं। महुआ एक औषधीय गुणों से युक्त वृक्ष है। आदिवासी क्षेत्रों में इसकी बहुलता होने के कारण इसका इस्तेमाल इस पूजा में किया जाता है। शाम को उपवास तोड़ने के बाद पसहर चावल खाया जाता है, जिसे लाल चावल भी कहा जाता है। इसमें एंटी-आक्सीडेन्ट की मात्रा अधिक होती है, जिसे एंथोसाइएनिंस भी कहते है। यह शरीर में होने वाली जलन, एलर्जी, कैंसर के खतरे को कम और वजन को नियंत्रित रखने में सहायता प्रदान करता है।
इस मौके पर छत्तीसगढ़ की प्रथम महिला आईपीएस अफसर अंकिता शर्मा ने ठेठ छत्तीसगढ़ी अंदाज में महिलाओं को शुभकामना देते हुए एक कविता पोस्ट की। जो जम कर वायरल हो रही।






