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छमापन दिवस – आत्मा को शुद्ध करता है यह महापर्व। इस अवसर पर देखिए प्राचीनतम जैन मूर्तिकला संग्रह इस लेख में।

newsmrl.com Chhamapan Day - This great festival purifies the soul update by Rihan Ibrahim

भाद्रपद मास में जैन धर्मावलंबियों द्वारा पर्वाधिराज पर्युषण पर्व मनाया जाता है।

श्वेताम्बर संप्रदाय को मानने वाले पर्युषण पर्व को भाद्रपद मास में कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी से भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पंचमी तक मनाते हैं, जबकि दिगंबर संप्रदाय के लोग इस महापर्व को भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी से चतुर्दशी तक मनाते हैं। पर्युषण पर्व सभी पर्वों का राजा है। इसे आत्मशोधन का पर्व भी कहा गया है।

इस त्योहार को आध्यात्मिक दीवाली की संज्ञा दी गई है। इस पर्व पर लोग अपने वर्षभर के पुण्य पाप का पूरा हिसाब करते हैं। यह पर्व हमारी सोई हुई आत्मा को जागृत करता है। इस पर्व को पर्वाधिराज भी कहते हैं। यह पर्व हमें क्षमा मांगने और क्षमा करने की सीख देता है। इस त्योहार के दौरान जैन धर्म के पांच सिद्धांत अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह व्रत का पालन किया जाता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि की प्राप्ति में ज्ञान व भक्ति के साथ सद्भावना का होना अनिवार्य है। दिगम्बर मत के अनुयायी 10 दिनों तक विभिन्न व्रतों का पालन करते हैं इसलिए इसे दशलक्षणा पर्व कहा जाता है। वहीं, श्वेताम्बर समुदाय के लोग इस पर्व को आठ दिनों तक मनाते हैं, इसलिए पर्युषण पर्व को आष्टाहिक के रूप में मनाते हैं। यह पर्व अहिंसा के व्रत पर चलने की राह दिखाता है। यह पर्व हमें प्रकृति से जुड़ने की सीख भी देता है।

आज का दिन ”संवत्सरी महापर्व“ जो क्षमा का दिन भी है। आज के दिन हम सब से क्षमायाचना करते है, सब छोटे, बड़ो से विनयपुर्वक मन, वचन, काया से खमतखामणा करते है। खमत-खामणा इसलिए करते है, जो वर्षभर के दरम्यान हमसे जो भी अविनय, अविवेद, असातना हुई हो, उसके लिए खमतखामणा करते है।

सात दिन पर्यूषण के अभ्यास के बितने के बाद आज संवत्सरी का दिन परिक्षा का है। आज का दिन आदान-प्रदान का भी है। आदान-प्रदान क्षमा का होता है। ”(क्षमालेना-क्षमादेना)“। स्वदोष को पहचान कर, चिंतन, मनन कर आराधना के दिनो मे अपने भवभ्रमण को कम कम करना (घटना) चाहिए, आराधना करके इसे घटाया जा सकता है। अशुभ विचार अगर लम्बे समय तक स्वभाव मे रहे, तो वह जीव का भव बिगाड सकता

अगर छाछ लम्बे समय तक बाहर रहता है, तो उसमे खटास आ जाती है, वैसे ही अगर एक जीव, दूसरे जीव से लम्बे काल तक बैर रखने से उस जीव का भव बिगड जाता है; जिस से जीव नरक, तिर्थंच की गती का बंध कर लेता है।

क्षमा का दिन केवल जैन दर्शन मे ही नही, अन्य धर्मो मे भी बताया है। आज के दिन हमे तीन बातें याद रखनी चाहिए

(प) याद करना = भगवान महावीर के चरित्र को याद कर, सीखना चाहिए के हमारे भगवान ने कैसे, और कितने उपसर्ग को सहन किया।

(पप) साफ करना = अपने अंदर के कषाय (क्रोध, मान, माया, लोभ) आदि बुराइयोओ का अपने अंदर से साफ करना चाहिए।
(पपप) माफ करना = सब जीवो से मन, वचन, काया से क्षमा को अपनाना चाहिए और दूसरों को क्षमा भी कर देना चाहिए। जैसे दिवालो को रंगने का पर्व = ”दिवाली“ है शरीर को रंगने का पर्व = ”होली“ है आत्मा को रंगने का पर्व = ”पर्यूषण पर्व“ है।

Most sculptures could be dated from the 2nd century BC to the 12th century CE, thus representing a continuous period of about 14 centuries during which Jainism flourished at Mathura. These sculptures are now housed in the Lucknow State Museum and in the Mathura Museum.
Tirthankar statue from KanKali tila.Theidols of Jain Tirthankaras obtained here are exclusively Sky clad (Digambara) and somehow make us believe that there was no division in Jainism Prior to this time.
Lohanipur Torso.it is believed that Jain statues of Tirthankaras with decorations around, vigraha, yakshas, ashta mangala like Srivatsa cannot be older to this, so claiming Idols from Girnar and elsewhere as oldest cant be historically proven.
Lord Neminatha At Girnar.Quite famous and undoubtedly the Oldest free standing Colossal Jain statue is that of Jina Bahubali, at Shravanbelgola, karnataka.

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