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मराठा आरक्षण पर SC में बोले राज्य, 50% की सीमा कोई लक्ष्मण रेखा नहीं।

Newsmrl.com maratha arakshan update by kiran rawat

मराठा रिजर्वेशन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान आरक्षण के पक्ष में केंद्र व राज्य सरकारों की तरफ से कई महत्वपूर्ण दलीलें पेश की गईं।

चीफ जस्टिस एस ए बोबडे के नेतृत्व वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। केंद्र सरकार ने इस संवेदनशील मामले में राजनीतिक मतभेदों को दरकिनार करते हुए राज्य सरकार के फैसले का समर्थन किया।

केंद्र की ओर से दलील दी गई है कि राज्य ने मराठा को जो रिजर्वेशन दिया है वह फैसला संवैधानिक है और संविधान के 102 वें संशोधन से राज्य के विधायी अधिकार खत्म नहीं होता है। जानते हैं इस मामले में केंद्र सरकार, महाराष्ट्र सरकार के साथ ही अन्य राज्यों की तरफ से क्या दलीलें पेश की गईं।

केंद्र : सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा :
वर्ष 2018 में लाए गए 102वें संविधान संशोधन कानून में अनुच्छेद 338 बी, जो राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के ढांचे, दायित्वों और शक्तियों से संबंधित है, तथा अनुच्छेद 342ए, जो किसी खास जाति को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा घोषित करने की राष्ट्रपति की शक्ति और सूची में बदलाव की संसद की शक्ति से संबंधित है, लाए गए थे।
एसईबीसी कानून 2018 के मद्देनजर महाराष्ट्र द्वारा राज्य में नौकरियों और दाखिलों में मराठा समुदाय के लोगों को आरक्षण देना संवैधानिक है। ‘केंद्र का मत है कि महाराष्ट्र एसईबीसी कानून संवैधानिक है।’

केंद्र अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल के अभिवेदनों को स्वीकार करता है और इसे केंद्र सरकार का मत माना जाना चाहिए।
अटॉर्नी जनरल ने 18 मार्च को शीर्ष अदालत से कहा था कि संविधान का 102वां संशोधन राज्य विधायिकाओं को एसईबीसी निर्धारित करने और उन्हें लाभ देने के लिए कानून लाने से वंचित नहीं करता। मेहता ने कहा कि संशोधन के जरिए लाया गया अनुच्छेद 342 ए राज्यों को एसईबीसी घोषित करने की शक्ति से वंचित नहीं करता।
संविधान पीठ ने केंद्र से पूछा सवाल
केंद्र ने आज की तारीख तक अनुच्छेद 342 ए के तहत एसईबीसी की कोई अधिसूचना जारी क्यों नहीं की है? इस पर मेहता ने कहा कि इन सभी सवालों के जवाब तब दिए जाएंगे जब पीठ 102वें संविधान संशोधन को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करेगी।

झारखंड : सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने कही ये बातें

आरक्षण की सीमा जूडिशरी की तरफ से तय नहीं की जानी चाहिए। इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट को राज्यों को फ्री हैंड देना चाहिए।
यदि आप गुजरात, राजस्थान, बिहार, ओडिशा के अंदरूनी इलाके में जाते हैं, तो आप देखेंगे कि लोग कैसे शिक्षा और नौकरियों के लिए तरस रहे हैं।
राज्य लोगों को स्कूल और शिक्षक प्रदान करने में विफल रहे हैं। यह सब ग्राउंड लेवल पर सरकार की तरफ से किया जाना है ना कि कोर्ट की तरफ से।
यदि सरकार इसमें असफल होती है तो इसका फैसला लोगों को करने दें। लोग उन्हें सत्ता से बाहर कर देंगे। कृपया, इस पर उदार और निष्पक्ष रुख अपनाएं।
कानून स्थिर नहीं है। इसे जरूरतों को पूरा करना चाहिए और समय के हिसाब से इसमें बदलाव जरूरी है।

राजस्थान : सीनियर एडवोकेट मनीष सिंघवी की दलीलें पिछले 26 वर्षों में ओबीसी की संख्या दोगुनी हो गई है क्योंकि सूची में यह संख्या 54 थी जो अब 91 है। इंदिरा साहनी ने स्वयं कुछ मामलों में 50 प्रतिशत से अधिक की अनुमति दी थी और यह होनी चाहिए। इसे लक्ष्मण रेखा की तरह नहीं माना जा सकता।

बिहार : एडवोकेट मनीष सिंह की दलील
राज्य में 1993 में ओबीसी की संख्या 129 से बढ़कर 2021 में 174 हो गई है।
समानता को एक स्नैपशॉट या स्थिर छवि के रूप में नहीं देखा जा सकता है और इसे फिल्म की तरह देखा निरंतरता के रूप में देखा जाना चाहिए। 1992 की समानता या बराबरी 2021 में समान नहीं हो सकती है।

इस मामले में कर्नाटक, पंजाब, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश सहित अन्य राज्यों ने भी इसी तरह का रुख अपनाया। इस मामले में बुधवार को भी सुनवाई जारी रहेगी।

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